कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
आप तो हुजूर हैं सरकार हैं।
बाग़ की रौनक हैं सदा बहार हैं।
सुनते हैं- दिल्ली में गद्दी गई है जम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
जनहित में कराते सदा यग्य जाप,
सैकड़ों के मसीहा लाखों के माई बाप।
आप किसी अवतार से बिलकुल नहीं हैं कम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
आपको कष्ट दूँ यह मुझे भाया नहीं,
यही सोच आपके दरवार में आया नहीं।
आपके तो चाकर भी पीते हैं विदेशी रम ।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
शीशे के गलियारे में आप हैं पत्थर,
आप की दुक्की इक्के को करे सर।
आपसे टकराने की किसमें है दम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
-स्वर्गीय कवि अशोक अम्बर इटावा
Thursday, March 29, 2012
Wednesday, March 28, 2012
भ्रष्टाचार
मिटाना है अब भ्रष्टाचार, जगाएं मन में शुद्ध विचार।
करें हम तौबा तृष्णा से सभी के प्रति हो सद व्यवहार॥
---------------------------------------------
स्वारथ तृष्णा त्यागना अति दुस्तर सोपान ।
फिर कैसे संभव यहाँ सदाचार परिधान॥
सदाचार परिधान मान की अभिलाषा में।
आँख फोड़ना उचित अठेनी परिभाषा में॥
त्याग, तपस्या युक्त कठिन होता है सत्पथ।
पूरा सिस्टम हेंग बनाता तृष्णा स्वारथ॥
-देवेश शास्त्री , इटावा
करें हम तौबा तृष्णा से सभी के प्रति हो सद व्यवहार॥
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स्वारथ तृष्णा त्यागना अति दुस्तर सोपान ।
फिर कैसे संभव यहाँ सदाचार परिधान॥
सदाचार परिधान मान की अभिलाषा में।
आँख फोड़ना उचित अठेनी परिभाषा में॥
त्याग, तपस्या युक्त कठिन होता है सत्पथ।
पूरा सिस्टम हेंग बनाता तृष्णा स्वारथ॥
-देवेश शास्त्री , इटावा
Monday, March 26, 2012
गुरुमंत्र
मेरे साहितिक गुरु श्राध्येय शर्मा जी ने दिया था गुरुमंत्र , इसी मन्त्र की साधना में हूँ । --
सीढियां उनके लिए अमोघ जिन्हें बस छत तक जाना है।
सितारों पर है जिनकी दृष्टि उन्हें पथ आप बनाना है।।
सत्यमेव जयते !
सीढियां उनके लिए अमोघ जिन्हें बस छत तक जाना है।
सितारों पर है जिनकी दृष्टि उन्हें पथ आप बनाना है।।
सत्यमेव जयते !
Friday, March 16, 2012
महाजनों येन गतः स पन्थः
महापुरुष जिस रास्ते से गए वही सन्मार्ग है। सत +मार्ग = सन्मार्ग। सत-चित -आनंद = सच्चिदानंद । सत्यम ब्रह्म जगन्मिथ्या । महापुरुष वे नहीं हैं जो दिख रहे हैं वे तो कालनेमि हैं। सत्यनिष्ठ यानि ब्रह्मनिष्ठ , चूँकि सत्य ही ब्रह्म है तो सत्य निष्ठा ही ब्रह्म निष्ठा है , अनासक्त यानी आसक्ति व विरक्ति के झंझट से परे, आत्मतत्व के चिंतन में रत, समत्वयोगी , विज्ञानी अर्थात तत्वज्ञानी , सत्वगुनों से युक्त महापुरुष के गमनपथ का प्रकाश पुंज कौन है? आचार्य। आचार्य का अर्थ है आचरण के योग्य। यथा- पूज्य=पूजा के योग्य, मान्य=सम्मान के योग्य आदि आदि। चर धातु में आ उपसर्ग और यत प्रत्यय (आ+चार+यत=आचार्य) जिसका आचरण अनुकरणीय है वही आचार्य है यानि मास्टर । आचार्य टार्च है सन्मार्ग पर बढ़ने के लिए।
Monday, March 12, 2012
मैं अकिंचन कुछ नहीं
सब कुछ तो उसका है। मैं हूँ उसका , वह है मेरा, सब कुछ।
वह जो चाहे, वह ही होता, वृथा दंभ क्यों पालें?
न तो कवी हूँ , न ही लेखक, और न ही उपदेशक हूँ।
सच में मैं जो लिखता, गाता, कहता, सहता
यानि सारी क्रिया-प्रतिक्रिया
उसकी मर्जी से होती है।
मैं उसी नट के हाथ में बंधी डोरी की कठपुतली हूँ।
भला मेरी क्या औकात किसी को गाली दूँ , निमित्त मात्र हो सकता हू।
Tuesday, March 6, 2012
गबाह होना !
अपराध इसलिए बढ़ते रहे। क्योंकि गबाह भी गबाह बनने से कतराते हैं. गबाह होने का अर्थ हैं जान देना।
मुकदमा ७०२/२०११ का मैं गबाह हूँ ४-८-११ को पडोसी राम बाबू बर्तन व्यवसाई की पुत्र बधू की हत्या कर दिन दहाड़े गायब की गई। मृतका मंजू के पिता बंशी लाल निवासी इंदौर ने पुत्री को गायब करने के लिए समधी रामबाबू व दामाद धर्मेन्द्र ७ लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराइ थी।
१- रामबाबू, रमाकांत, राजेश कुमार वकील, दुर्गा, अमित, सनी, भोले और पोंपा मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। इन लोगों ने गबाही न देने के लिए सभी हथकंडे अपनाए लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा से समझौता न करने पर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या हो सकती है।
२- मेरी बूढी माता जी चबूतरे पर बैठी थी, एक ईंट मारी गई जो निशाना चूक जाने से सर के ऊपर से निकलकर दीवार से टकराई। होली के पहले ३ दिनों घर में ईंट-पत्थर फिके।
३- २२ सितम्बर की दुर्घटना में मैं किस हालत मै सैफई मैं था पूरा परिवार परिचर्या में था, मकान खाली था । रामबाबू का नाती चोरी की नियत से चढ़ा। इंटों से बने खम्भे से रस्सी बाँध कर वह उतरा तो ५-५ फुट के तीन खम्भे धराशाही हो गए, क्योंकि चारो खम्भे टीन-शैड के लिए एंगिल में कसे थे।
४- मेरे ऊपर दबाव बनाने को राजेश वकील ने कानपुर जाकर मेरे बड़े भाई से विनती की। कुछ वकीलों से भी सिफारिस की। मैं सत्य पर अडिग हूँ , धन के प्रलोभन का भी प्रयास हुआ।
५- तथा कथित वैद्य रमाकांत के पास ८० के दसक में दिनरात का कार्ड बना था, इस लिहाज से वह पत्रकार रहा । रमाकांत ने कुछ पत्रकारों के माध्यम से दबाव का प्रयास किया, व्यापारी नेताओं लालू गुट से भी मुझे फ़साने का प्रयास किया।
६-तथा कथित वैद्य - पत्रकार रमाकांत ने दिनरात के अपने पुराने साथी ज्ञानार्थी पर डोरे डाले , काफी सफलता भी मिली। आई ऐ सी आन्दोलन में स्वयं फर्जी कर्ताधर्ता ज्ञानार्थी ने मेरे खिलाफ मुहीम छेड़ दी। फिर क्या था मंजू-काण्ड के आरोपिओं की बांछे खिल गईं। इसका खुलासा तब हुआ जब तथा कथित वैद्य रमाकांत व वकील के साहबजादों को आपस में खुशियाँ मनाते देखा गया- अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे ख़ुद उन्ही के साथिओ ने उसे (devesh) को 420 सावित कर दिया । दूसरी ओर ज्ञानार्थी ने इस दुरभि संधि का संकेत तब दिया जब पंगुजी के १९८६ के घटना क्रम के जानकारी ख़ुद मुझसे लेनी चाही। यानि सत्य एक बार फिर जीता।
७- पराने खिलाडीरामबाबू ने प्रसिद्द मिस्त्री जियालाल की ओलादों को भागने के बाद अपने अग्रज श्रीकृष्ण अनुज राजबहादुर, विजय सिंह को उनकी अचल संपत्ति take भाव हथियाकर बेदखल कर दिया फिर कामता खटिक का मकान भी रोचक अंदाज में अपने कब्जे में किया खटिक पुत्र केशकुमार देशकुमार bedhar हो गए थे। कुछ इसी अंदाज में मेरे घर पर भी उसकी नजर ही नहीं रहीं बल्कि पिता जी पर प्रेस्सर बनाया, वे मरने से पहले कही दफा कहते रहे - बेटा ये मकान इन्हीं को बेच कर चलें, मैं कहकर टालता रहा- पापा! यहीं रहना है। एसे में ज्ञानार्थी का पंगुजी के बारे में जानकारी मागना का क्या आर्थ है?
साथिओ ! सब उपाय कर चुकने के बाद अब रामबाबू की संताने और नाती सीधे-सीधे मेरे परिवार की सामूहिक हत्या पर उतारू हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसका संकेत मौहल्ले के उन जैनियो ने यह कहकर दिया, गबाही छोडो सपथ पत्र देदो। जो अपने घर की सदस्य को मर सकते हैं उनके लिए तुम क्या चीज हो। यह सुझाव देने वाले वे जैनी हैं जिन्होंने मंजू-कांड के आरोपियों के पक्ष में शपथ पत्र दिए थे। क्या जिओ औरजीने दो का अर्थ यह है की राक्षसों को जीने दो और जमा खोरी- मिलावटखोरी कर जनता को लुटते हुए जिओ।
सत्यमेव जयते।
मुकदमा ७०२/२०११ का मैं गबाह हूँ ४-८-११ को पडोसी राम बाबू बर्तन व्यवसाई की पुत्र बधू की हत्या कर दिन दहाड़े गायब की गई। मृतका मंजू के पिता बंशी लाल निवासी इंदौर ने पुत्री को गायब करने के लिए समधी रामबाबू व दामाद धर्मेन्द्र ७ लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराइ थी।
१- रामबाबू, रमाकांत, राजेश कुमार वकील, दुर्गा, अमित, सनी, भोले और पोंपा मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। इन लोगों ने गबाही न देने के लिए सभी हथकंडे अपनाए लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा से समझौता न करने पर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या हो सकती है।
२- मेरी बूढी माता जी चबूतरे पर बैठी थी, एक ईंट मारी गई जो निशाना चूक जाने से सर के ऊपर से निकलकर दीवार से टकराई। होली के पहले ३ दिनों घर में ईंट-पत्थर फिके।
३- २२ सितम्बर की दुर्घटना में मैं किस हालत मै सैफई मैं था पूरा परिवार परिचर्या में था, मकान खाली था । रामबाबू का नाती चोरी की नियत से चढ़ा। इंटों से बने खम्भे से रस्सी बाँध कर वह उतरा तो ५-५ फुट के तीन खम्भे धराशाही हो गए, क्योंकि चारो खम्भे टीन-शैड के लिए एंगिल में कसे थे।
४- मेरे ऊपर दबाव बनाने को राजेश वकील ने कानपुर जाकर मेरे बड़े भाई से विनती की। कुछ वकीलों से भी सिफारिस की। मैं सत्य पर अडिग हूँ , धन के प्रलोभन का भी प्रयास हुआ।
५- तथा कथित वैद्य रमाकांत के पास ८० के दसक में दिनरात का कार्ड बना था, इस लिहाज से वह पत्रकार रहा । रमाकांत ने कुछ पत्रकारों के माध्यम से दबाव का प्रयास किया, व्यापारी नेताओं लालू गुट से भी मुझे फ़साने का प्रयास किया।
६-तथा कथित वैद्य - पत्रकार रमाकांत ने दिनरात के अपने पुराने साथी ज्ञानार्थी पर डोरे डाले , काफी सफलता भी मिली। आई ऐ सी आन्दोलन में स्वयं फर्जी कर्ताधर्ता ज्ञानार्थी ने मेरे खिलाफ मुहीम छेड़ दी। फिर क्या था मंजू-काण्ड के आरोपिओं की बांछे खिल गईं। इसका खुलासा तब हुआ जब तथा कथित वैद्य रमाकांत व वकील के साहबजादों को आपस में खुशियाँ मनाते देखा गया- अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे ख़ुद उन्ही के साथिओ ने उसे (devesh) को 420 सावित कर दिया । दूसरी ओर ज्ञानार्थी ने इस दुरभि संधि का संकेत तब दिया जब पंगुजी के १९८६ के घटना क्रम के जानकारी ख़ुद मुझसे लेनी चाही। यानि सत्य एक बार फिर जीता।
७- पराने खिलाडीरामबाबू ने प्रसिद्द मिस्त्री जियालाल की ओलादों को भागने के बाद अपने अग्रज श्रीकृष्ण अनुज राजबहादुर, विजय सिंह को उनकी अचल संपत्ति take भाव हथियाकर बेदखल कर दिया फिर कामता खटिक का मकान भी रोचक अंदाज में अपने कब्जे में किया खटिक पुत्र केशकुमार देशकुमार bedhar हो गए थे। कुछ इसी अंदाज में मेरे घर पर भी उसकी नजर ही नहीं रहीं बल्कि पिता जी पर प्रेस्सर बनाया, वे मरने से पहले कही दफा कहते रहे - बेटा ये मकान इन्हीं को बेच कर चलें, मैं कहकर टालता रहा- पापा! यहीं रहना है। एसे में ज्ञानार्थी का पंगुजी के बारे में जानकारी मागना का क्या आर्थ है?
साथिओ ! सब उपाय कर चुकने के बाद अब रामबाबू की संताने और नाती सीधे-सीधे मेरे परिवार की सामूहिक हत्या पर उतारू हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसका संकेत मौहल्ले के उन जैनियो ने यह कहकर दिया, गबाही छोडो सपथ पत्र देदो। जो अपने घर की सदस्य को मर सकते हैं उनके लिए तुम क्या चीज हो। यह सुझाव देने वाले वे जैनी हैं जिन्होंने मंजू-कांड के आरोपियों के पक्ष में शपथ पत्र दिए थे। क्या जिओ औरजीने दो का अर्थ यह है की राक्षसों को जीने दो और जमा खोरी- मिलावटखोरी कर जनता को लुटते हुए जिओ।
सत्यमेव जयते।
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