मैं अकिंचन कुछ नहीं
सब कुछ तो उसका है। मैं हूँ उसका , वह है मेरा, सब कुछ।
वह जो चाहे, वह ही होता, वृथा दंभ क्यों पालें?
न तो कवी हूँ , न ही लेखक, और न ही उपदेशक हूँ।
सच में मैं जो लिखता, गाता, कहता, सहता
यानि सारी क्रिया-प्रतिक्रिया
उसकी मर्जी से होती है।
मैं उसी नट के हाथ में बंधी डोरी की कठपुतली हूँ।
भला मेरी क्या औकात किसी को गाली दूँ , निमित्त मात्र हो सकता हू।
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