Tuesday, March 6, 2012

गबाह होना !

अपराध इसलिए बढ़ते रहे। क्योंकि गबाह भी गबाह बनने से कतराते हैं. गबाह होने का अर्थ हैं जान देना।
मुकदमा ७०२/२०११ का मैं गबाह हूँ ४-८-११ को पडोसी राम बाबू बर्तन व्यवसाई की पुत्र बधू की हत्या कर दिन दहाड़े गायब की गई। मृतका मंजू के पिता बंशी लाल निवासी इंदौर ने पुत्री को गायब करने के लिए समधी रामबाबू व दामाद धर्मेन्द्र लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराइ थी।
१- रामबाबू, रमाकांत, राजेश कुमार वकील, दुर्गा, अमित, सनी, भोले और पोंपा मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। इन लोगों ने गबाही न देने के लिए सभी हथकंडे अपनाए लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा से समझौता न करने पर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या हो सकती है।
२- मेरी बूढी माता जी चबूतरे पर बैठी थी, एक ईंट मारी गई जो निशाना चूक जाने से सर के ऊपर से निकलकर दीवार से टकराई। होली के पहले ३ दिनों घर में ईंट-पत्थर फिके।
३- २२ सितम्बर की दुर्घटना में मैं किस हालत मै सैफई मैं था पूरा परिवार परिचर्या में था, मकान खाली था । रामबाबू का नाती चोरी की नियत से चढ़ा। इंटों से बने खम्भे से रस्सी बाँध कर वह उतरा तो ५-५ फुट के तीन खम्भे धराशाही हो गए, क्योंकि चारो खम्भे टीन-शैड के लिए एंगिल में कसे थे।
४- मेरे ऊपर दबाव बनाने को राजेश वकील ने कानपुर जाकर मेरे बड़े भाई से विनती की। कुछ वकीलों से भी सिफारिस की। मैं सत्य पर अडिग हूँ , धन के प्रलोभन का भी प्रयास हुआ।
५- तथा कथित वैद्य रमाकांत के पास ८० के दसक में दिनरात का कार्ड बना था, इस लिहाज से वह पत्रकार रहा । रमाकांत ने कुछ पत्रकारों के माध्यम से दबाव का प्रयास किया, व्यापारी नेताओं लालू गुट से भी मुझे फ़साने का प्रयास किया।
६-तथा कथित वैद्य - पत्रकार रमाकांत ने दिनरात के अपने पुराने साथी ज्ञानार्थी पर डोरे डाले , काफी सफलता भी मिली। आई ऐ सी आन्दोलन में स्वयं फर्जी कर्ताधर्ता ज्ञानार्थी ने मेरे खिलाफ मुहीम छेड़ दी। फिर क्या था मंजू-काण्ड के आरोपिओं की बांछे खिल गईं। इसका खुलासा तब हुआ जब तथा कथित वैद्य रमाकांत व वकील के साहबजादों को आपस में खुशियाँ मनाते देखा गया- अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे ख़ुद उन्ही के साथिओ ने उसे (devesh) को 420 सावित कर दिया । दूसरी ओर ज्ञानार्थी ने इस दुरभि संधि का संकेत तब दिया जब पंगुजी के १९८६ के घटना क्रम के जानकारी ख़ुद मुझसे लेनी चाही। यानि सत्य एक बार फिर जीता।
७- पराने खिलाडीरामबाबू ने प्रसिद्द मिस्त्री जियालाल की ओलादों को भागने के बाद अपने अग्रज श्रीकृष्ण अनुज राजबहादुर, विजय सिंह को उनकी अचल संपत्ति take भाव हथियाकर बेदखल कर दिया फिर कामता खटिक का मकान भी रोचक अंदाज में अपने कब्जे में किया खटिक पुत्र केशकुमार देशकुमार bedhar हो गए थे। कुछ इसी अंदाज में मेरे घर पर भी उसकी नजर ही नहीं रहीं बल्कि पिता जी पर प्रेस्सर बनाया, वे मरने से पहले कही दफा कहते रहे - बेटा ये मकान इन्हीं को बेच कर चलें, मैं कहकर टालता रहा- पापा! यहीं रहना है। एसे में ज्ञानार्थी का पंगुजी के बारे में जानकारी मागना का क्या आर्थ है?
साथिओ ! सब उपाय कर चुकने के बाद अब रामबाबू की संताने और नाती सीधे-सीधे मेरे परिवार की सामूहिक हत्या पर उतारू हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसका संकेत मौहल्ले के उन जैनियो ने यह कहकर दिया, गबाही छोडो सपथ पत्र देदो। जो अपने घर की सदस्य को मर सकते हैं उनके लिए तुम क्या चीज हो। यह सुझाव देने वाले वे जैनी हैं जिन्होंने मंजू-कांड के आरोपियों के पक्ष में शपथ पत्र दिए थे। क्या जिओ औरजीने दो का अर्थ यह है की राक्षसों को जीने दो और जमा खोरी- मिलावटखोरी कर जनता को लुटते हुए जिओ।
सत्यमेव जयते।

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