Friday, March 16, 2012

महाजनों येन गतः स पन्थः

महापुरुष जिस रास्ते से गए वही सन्मार्ग है। सत +मार्ग = सन्मार्ग। सत-चित -आनंद = सच्चिदानंद । सत्यम ब्रह्म जगन्मिथ्या । महापुरुष वे नहीं हैं जो दिख रहे हैं वे तो कालनेमि हैं। सत्यनिष्ठ यानि ब्रह्मनिष्ठ , चूँकि सत्य ही ब्रह्म है तो सत्य निष्ठा ही ब्रह्म निष्ठा है , अनासक्त यानी आसक्ति व विरक्ति के झंझट से परे, आत्मतत्व के चिंतन में रत, समत्वयोगी , विज्ञानी अर्थात तत्वज्ञानी , सत्वगुनों से युक्त महापुरुष के गमनपथ का प्रकाश पुंज कौन है? आचार्य। आचार्य का अर्थ है आचरण के योग्य। यथा- पूज्य=पूजा के योग्य, मान्य=सम्मान के योग्य आदि आदि। चर धातु में आ उपसर्ग और यत प्रत्यय (आ+चार+यत=आचार्य) जिसका आचरण अनुकरणीय है वही आचार्य है यानि मास्टर । आचार्य टार्च है सन्मार्ग पर बढ़ने के लिए।

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