Monday, May 14, 2012

अकूत संपदा में �पद्मनाभ मंदिर� समान है ��नरसिंह मंदिर अस्तल��

अकूत संपदा में �पद्मनाभ मंदिर� समान है ��नरसिंह मंदिर अस्तल��
भारतीय संस्कृति में धर्म का एक विशेष महत्त्व रहा है और इसीलिए दान का भी महत्त्व रहा है। हमारे मंदिरों की सम्रद्धि सदैव से लुटेरों के आक्रमण का केंद्र रही है! पहले मुस्लिम आक्रान्ताओं ने सोमनाथ मंदिर को कई बार लूटा और अब इस्लामिक और ईसाई गठबंधन केरल के पद्मनाभ मंदिर को लूट रहा है, और देश के हिन्दू ये देख ही नहीं पा रहे हैं कि उनकी संपत्ति को छिना जा रहा है जो कि बाद में इस्लाम और ईसाइयत के प्रचार में लगाई जाएगी। उत्तर भारत में काशी विश्व्नाथ मंदिर, रामजन्मभूमि और कृष्ण जन्मस्थल आदि स्थानों पर हुए मुगल आक्रमण इतिहास के पन्नों में उलटफेर कर दर्शाये जाते रहे। दूसरी ओर उत्तर भारत का एक ऐसा भी मंदिर है जिसे संपदा के अनुसार उत्तर का पद्मनाभ मंदिर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह है इष्टिकापुरी (इटावा) का नरसिंह मंदिर अस्तल, जिसकी अकूत संपदा ��रहस्य�� है। काफी कुछ महंत परंपरा के चलते खुर्द-बुर्द हो चुकी है, इनमें बेशकीमती आभूषण और कई जिलों में फैली अचल संपदा है। यहां भी अकूत संपदा को लूटने को आलमगीर औरंगजेब आया था, लेकि‍न ईश्वरीय चमत्कार के आगे औरंगजेब नतमस्तक हो गया और उसने मंदिर तोड़ने का इरादा बदल दिया और वार्षिक वजीफे का राजाज्ञा पत्र दिया, जो आज भी है। लंबे समय तक वजीफा मिलता रहा और वैष्णव भक्तों की श्रद्धा-भक्ति से निरंतर संपदा बढ़ती गई। इतिहास के पन्नों से पता चलता है कि रामानुज वैष्णव संप्रदाय का मंदिर 11 वीं शताब्दी का है, रामानुजाचार्य का जीवन परिचय कुछ यूं है- 1017 ई. में रामानुज का जन्म दक्षिण भारत के तिरुकुदूर क्षेत्र में हुआ था। बचपन में उन्होंने कांची में यादव प्रकाश गुरु से वेदों की शिक्षा ली, रामानुजाचार्य आलवन्दार यामुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। गुरु की इच्छानुसार रामानुज ने उनसे तीन काम करने का संकल्प लिया थारू- ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबंधनम की टीका लिखना। उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्यागकर श्रीरंगम के यदिराज संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली। मैसूर के श्रीरंगम से चलकर रामानुज शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। रामानुज ने उस क्षेत्र में बारह वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया, फिर उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। 1137 ई. में वे ब्रह्मलीन हो गए। रामानुजाचार्य ��रामानुज वैष्णव संप्रदाय के प्रणेता है, अतः यह मंदिर संभवतः 11 वीं शताब्दी में बनाया गया होगा। इष्टिकापुरी (इटावा) के नरसिंह मंदिर अस्तल की ख्याति समूचे भूमंडल में थी, तभी तो आलमगीर औरंगजेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया। जन समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिये उसने बाबड़ी पर आकाश में चटाई बिछाकर नमाज पढ़ने का चमत्कार दिखाया। नरसिंह मंदिर अस्तल के महंत त्रिकालदर्शी भिड़ंग ऋषि उस समय यमुना स्नान कर रहे थे, उन्हें जैसे ही आक्रमण की अनुभूति हुई, वैसे ही मृगछालासन और कमंडल लेकर दौड़ते हुए आये और बोले - ��रे धूर्त! बंदकर ये तमाशा।�� औरंगजेब ने जवाब दिया- ��तूझमें ईश्वरीय शक्ति है तो दिखा चमत्कार, मै औरंगजेब हूं। बुत (मूर्तिपूजा) ढोंग है...�� वह कुछ और कहता मगर क्रोध में ऋषि भिड़ंग ने मृगछाला निकटवर्ती कुएं पर आकाश में फैला दी। ऋषि अपने आसन पर चढ़े ही थे, औरंगजेब चटाई सहित वाबड़ी (तालाब) पर जा गिरे मगर डूबे नहीं। ऋषि ने आकाश में बिछे आसन पर संध्या प्रारंभ करते हुए कहा- �� बोल डुबो दूं?�� हाथ में यमुना जल लेकर संकल्प मंत्र पढ़ना शुरू किया तो औरंगजेब चटाई सहित तालाब में डूबने लगा। मुंह से निकला - ��बाबा! बचाओ। बचाओ!!�� मंत्र पूरा होने वाला था, ऋषि भिड़ंग ने संकल्प का रूप बदल दिया-��..... आक्रांतायाः जीवन रक्षणार्थं नभे संध्यां करिष्ये।�� औरंगजेब चटाई सहित अपने आप जल से जमीन पर आ गये चारों ओर राधे-राधे गान होने लगा, औरंगजेब भी गाने लगा। संध्या पूरी होते ही औरंगजेब ऋषि के समक्ष नतमस्तक हुआ, उसने मंदिर को तोड़ने की इच्छा त्यागते हुए तत्काल नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा को नियमित रूप से आर्थिक सहायता (वजीफा) देते रहने का लिखित हुक्मनामा दिया। यह हुक्मनामा मंदिर के गर्भगृह के समक्ष स्थापित मानस्तंभ पर आज तक सुरक्षित है। नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा में ऋषि भिड़ंग के बाद उनके शिष्य गोपाल दास महंत हुए। एक सहस्राब्दी तक नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा में महंत ही सर्वेसर्वा होते थे। 1911 में महंत रामप्रपन्न रामानुज ने विचार किया- हो न हो आने आले महंत निष्ठावान न रह पायें और स्वार्थ पूर्ण महत्वाकांक्षा में मंदिर की गरिमा न गिरा दें। उन्होंने वसीयत की - ��नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा की सारी चल-अचल संपत्ति भगवान नरसिंह महाराज की होगी, व्यवस्था संचालन के लिए ट्रस्ट बनाया जाये, जो महंत को समुचित दिशा निर्देश देता रहे। वसीयत के आधार पर महंत रामप्रपन्न रामानुज ने प्रथम ट्रस्ट बनाया जिसके अध्यक्ष राजा नरसिंह राव बनाये गये, 5 ट्रस्टी थे। चूंकि राजा नरसिंह राव लखना स्टेट के उत्तराधिकार मसले पर प्रीमो सुप्रीम कोर्ट लंदन में बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू और ज्योती शंकर दीक्षित के साथ व्यस्त थे, लिहाजा नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा के ट्रस्ट पर कम ध्यान दे पाये। परंपरानुरूप महंत सर्वेसर्वा रहे। ट्रस्ट अस्तित्व में रहे, मगर मोनोपॉली महंतों की चलती रही। महंत जगदीश नारायण, नरसिंह मंदिर अस्तल के 11 वें महंत र्हैं मंदिर की संपदा खुर्द-बुर्द होती रही। महंत जगदीश नारायण 57 वर्ष से महंत पद पर हैं। 1965 में ट्रस्ट के अध्यक्ष राजाराम चौधरी ने एडवोकेट जनरल से परामर्श करते हुए अनुमति मांगी। 1966 में मुकदमा किया, सात वर्ष बाद 1973 में फैसला आया और प्राप्त आवेदनों के आधार ट्रस्ट घोषित किया, राजाराम सहित कई ट्रस्टी काल कवलित हो चुके हैं, लिहाजा अटल बिहारी चौधरी 205 लालपुरा इटावा को अध्यक्ष और ब्रजेश दुबे, भगवानदास शुक्ला, जगदीश गुप्ता, राम अवतार तुलसीपुरा और सुरेंद्र कुमार (जालौन) को अध्यक्ष घोषित किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मुकदमा नं0 323/1973 के 6-1-2010 के निर्णय में ट्रस्ट का अनुमोदन हुआ। 13 मई 2012 को ट्रस्ट की आमसभा हुई। �अस्तल� शब्द की पहचान आज अस्तल पुलिस चौकी के रूप में है। पहले अस्तल वार्ड था और अस्तल अखाड़ा था। उत्तर भारत में दक्षिण के पद्मनाभ मंदिर की तरह अकूत संपदा वाला अस्तल मंदिर भी है, यकीन नहीं होता। हो भी तो कैसे, नई और युवा पीढ़ी ने मंदिर देखा ही नहीं। अस्तल में मजबूत चहारदीवारी वाले तीन परकोटों के अंदर नरसिंह महाराज मंदिर का गर्भगृह है, बिल्कुल उसी शैली में जैसा वृन्दावन में रंगनाथ मंदिर चार परकोटों में है। कुछ समय पहले यहां 2-3 स्कूल थे। गौशाला थी, अखाड़ा था, मनमोहक बगीचा था, नरसिंह क्लब द्वारा नाटक होते थे। आज यहां तमाम गैराजे हैं जिनमें खड़ी हैं गाड़ियां, दो धान मील हैं, बहुमंजिली इमारतें और सैकड़ों किरायेदार हैं। बीते 57 वर्ष से महंत बने चले आ रहे जगदीश नारायण ही सर्वेसर्वा हैं अब ट्रस्ट के अस्तित्व में आने से महंतजी व्यथित दिख रहे हैं।

Tuesday, April 17, 2012


tekur dk loky gh ugha % 'kkL=h
bVkok]A uxj dh vLry iqfyl pkSdh }kjk ns'k/keZ laiknd nsos'k 'kkL=h  dks 'kkafrHkax dh vk'kadk esa ikcan fd;s tkus ds lanHkZ esa eaxyokj dks {ks=kf/kdkjh dk;kZy; esa Jh 'kkL=h ds c;ku ntZ gq,A lkseokj dks  ofj"B iqfyl v/kh{kd dks fn;s i= dh izfrfyfi crkSj c;ku nsos'k 'kkL=h us izLrqr  dhA
b/kj vkbZ,lh izHkkjh nsos'k 'kkL=h us dgk fd os  tekur ugha djk;saxs D;ksfd iqfyl dIrku us tkap dk vk'oklu fn;k gSA tkap dk  fu"d"kZ gh r; djsxk fd os iqfyl ds f[kykQ ekugkfu dk eqdnek rFkk izsl dkmafly vkWQ bafM;k esa vihy djsa xs ;k ughaA
pwafd 22 vizsy 2012 dks lR;fu"B o bZekunkj vf/kdkfj;ksa ds laxBu ^^lR;eso t;rs** dh cSBd vyhxat y[kuÅ fLFkr ;wih iz'kklfud ,dsfMfed laLFkku esa gks jgh gS ftlesa lfØ; lnL; nsos'k 'kkL=h ds izfr iqfyl ds joS;s  ij ppkZ gksxhA gkykafd 'kkL=h us cSBd esa 'kkfey ugha gksaxsA 
bl chp eqdnek ua- 702@2011 ¼bVkok dksrokyh½ ds vkjksfi;ksa o bVkok iqfyl dh nqjfHk laf/k  ds pyrs 7 eghus esa foospuk iwjh u gksus rFkk xokgksa dks ^^fBdkus** yxkus yxkus dh eqfge ds lkFk lektoknh O;kikj lHkk ds laj{k.k dks ysdj tukØks'k c<+rk tk jgk gSA czkã.k tkxzfr egklHkk] isa'kulZ ,lksf'k,'ku] lfork lekt] Hkkjr fodkl ifj"kn] f'k{kd laa?k] eaxy feyu lfefr lfgr yxHkx ntZuksa laxBuksa ds f'k"VeaMy vyx&vyx iqfyl dIrku] ftykf/kdkjh ds vykok eq[;ea=h o jkT;iky dks Kkiu nssaxsA izns'k Hkj esa bl eqn~ns ij izn'kZu Hkh gks ldrs gSA

Thursday, April 12, 2012

शशि भूषण उपाध्याय का इटावा आगमन १३ को

सत्यनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों / कर्मचारियों के संगठन सत्यमेव जयते के आधार स्तंभों में शामिल श्री शशि भूषण उपाध्याय (सेवा योजन अधिकारी कानपुर) शुक्रवार १३ अप्रैल २०१२ को इटावा पधार रहे हैं, वे शाम ६ बजे नगर पालिका के सभागार में आचार्य मोहन मिश्र की १३ वीं पुन्यतिथ पर आयोजित व्याख्यानमाला में अपने विचार व्यक्त करेंगे। आप सभी सादर आमंत्रित हैं । -----संयोजक-महेश चन्द्र तिवारी प्राचार्य

Wednesday, April 11, 2012

धर्मो रक्षति रक्षितः

न तंत्र चले न मन्त्र। जब हो निर्मल बाबा तेरी कृपा। जय गुरुदेव नाम परमात्मा का। ये जुमले क्या कहते हैं ? ऐसे कितने बाबा वेशधारी हमारी धर्म भीरुता का लाभ उठाकर लुटाने में लगे हैं। आदिगुरू शंकराचार्य ने इन कालनेमियों के बारे में स्पष्ट लिखा- जटिलो मुंडी लुन्चित केशः काशायाम्बर बहुकृत वेशः । पश्यति न च पश्यद लोके ह्यदुर निमित्तं बहुकृत शोकः॥ जटाधारी, सफाचट, केशलोची, गेरुआ बस्त्रधारी उस सत्य को देखते हुए भी नहीं देखते सिर्फ उदर पूर्ति (अकूत धन संपदा बटोरने) में तरह-तरह के तमासे करते हैं।
धर्म के मर्म से अपरचित धर्मभीरु जनता का शोषण और लूटमार कर रहे हैं। ऐसे अधर्मी कालनेमियों से धर्म को बचाना होगा, धर्मो रक्षति रक्षितः ॥ धर्म की रक्षा करने बाले की धर्म रक्षा करता है।

Wednesday, April 4, 2012

क्या है जनसभा

जनसभा ? वह नहीं जो आप समझ रहें होंगे। यह है भ्रष्टाचार से संसदीय जनतंत्र को बचाने का वैचारिक क्रान्ति अभियान।
जनतंत्र की प्राणवायु है- जन। जन समूह (मतदाताओं) द्वारा स्वयं की दशा, नेताओं का छलावा, लूटमार से निजात पाने हेतु सामूहिक चिंतनकर अपनी सकती का नाम है जनसभा।
जनता अपनी सेवा के लिए चुनते हैं सेवक। यानि संसद, विधान मंडल हैं जनसेवको के सभा स्थल । सेवकों की सभाओं (निकायों, पंचायतों,राज्य सभा, लोकसभा, विधानसभा) में चोर, लुटेरों, हत्यारों बकात्कारिओं ने कब्जा जमा लिया। सेवकों को सुधारेगा कौन? स्वामी। यानि हम-आप (जनता) जनता की संसद (जनसभा) लाएगी वैचारिक क्रान्ति। IAC ETAWAH

Thursday, March 29, 2012

कहाँ आप - कहाँ हम

कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
आप तो हुजूर हैं सरकार हैं।
बाग़ की रौनक हैं सदा बहार हैं।
सुनते हैं- दिल्ली में गद्दी गई है जम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
जनहित में कराते सदा यग्य जाप,
सैकड़ों के मसीहा लाखों के माई बाप।
आप किसी अवतार से बिलकुल नहीं हैं कम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
आपको कष्ट दूँ यह मुझे भाया नहीं,
यही सोच आपके दरवार में आया नहीं।
आपके तो चाकर भी पीते हैं विदेशी रम ।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।
शीशे के गलियारे में आप हैं पत्थर,
आप की दुक्की इक्के को करे सर।
आपसे टकराने की किसमें है दम।
कहाँ आप - कहाँ हम। कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम।

-स्वर्गीय कवि अशोक अम्बर इटावा

Wednesday, March 28, 2012

भ्रष्टाचार

मिटाना है अब भ्रष्टाचार, जगाएं मन में शुद्ध विचार।
करें हम तौबा तृष्णा से सभी के प्रति हो सद व्यवहार॥
---------------------------------------------
स्वारथ तृष्णा त्यागना अति दुस्तर सोपान ।
फिर कैसे संभव यहाँ सदाचार परिधान॥
सदाचार परिधान मान की अभिलाषा में।
आँख फोड़ना उचित अठेनी परिभाषा में॥
त्याग, तपस्या युक्त कठिन होता है सत्पथ।
पूरा सिस्टम हेंग बनाता तृष्णा स्वारथ॥
-देवेश शास्त्री , इटावा

Monday, March 26, 2012

गुरुमंत्र

मेरे साहितिक गुरु श्राध्येय शर्मा जी ने दिया था गुरुमंत्र , इसी मन्त्र की साधना में हूँ । --
सीढियां उनके लिए अमोघ जिन्हें बस छत तक जाना है।
सितारों पर है जिनकी दृष्टि उन्हें पथ आप बनाना है।।
सत्यमेव जयते !

Friday, March 16, 2012

महाजनों येन गतः स पन्थः

महापुरुष जिस रास्ते से गए वही सन्मार्ग है। सत +मार्ग = सन्मार्ग। सत-चित -आनंद = सच्चिदानंद । सत्यम ब्रह्म जगन्मिथ्या । महापुरुष वे नहीं हैं जो दिख रहे हैं वे तो कालनेमि हैं। सत्यनिष्ठ यानि ब्रह्मनिष्ठ , चूँकि सत्य ही ब्रह्म है तो सत्य निष्ठा ही ब्रह्म निष्ठा है , अनासक्त यानी आसक्ति व विरक्ति के झंझट से परे, आत्मतत्व के चिंतन में रत, समत्वयोगी , विज्ञानी अर्थात तत्वज्ञानी , सत्वगुनों से युक्त महापुरुष के गमनपथ का प्रकाश पुंज कौन है? आचार्य। आचार्य का अर्थ है आचरण के योग्य। यथा- पूज्य=पूजा के योग्य, मान्य=सम्मान के योग्य आदि आदि। चर धातु में आ उपसर्ग और यत प्रत्यय (आ+चार+यत=आचार्य) जिसका आचरण अनुकरणीय है वही आचार्य है यानि मास्टर । आचार्य टार्च है सन्मार्ग पर बढ़ने के लिए।

Monday, March 12, 2012

मैं अकिंचन कुछ नहीं
सब कुछ तो उसका है। मैं हूँ उसका , वह है मेरा, सब कुछ।
वह जो चाहे, वह ही होता, वृथा दंभ क्यों पालें?
न तो कवी हूँ , न ही लेखक, और न ही उपदेशक हूँ।
सच में मैं जो लिखता, गाता, कहता, सहता
यानि सारी क्रिया-प्रतिक्रिया
उसकी मर्जी से होती है।
मैं उसी नट के हाथ में बंधी डोरी की कठपुतली हूँ।


भला मेरी क्या औकात किसी को गाली दूँ , निमित्त मात्र हो सकता हू।


Tuesday, March 6, 2012

गबाह होना !

अपराध इसलिए बढ़ते रहे। क्योंकि गबाह भी गबाह बनने से कतराते हैं. गबाह होने का अर्थ हैं जान देना।
मुकदमा ७०२/२०११ का मैं गबाह हूँ ४-८-११ को पडोसी राम बाबू बर्तन व्यवसाई की पुत्र बधू की हत्या कर दिन दहाड़े गायब की गई। मृतका मंजू के पिता बंशी लाल निवासी इंदौर ने पुत्री को गायब करने के लिए समधी रामबाबू व दामाद धर्मेन्द्र लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराइ थी।
१- रामबाबू, रमाकांत, राजेश कुमार वकील, दुर्गा, अमित, सनी, भोले और पोंपा मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। इन लोगों ने गबाही न देने के लिए सभी हथकंडे अपनाए लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा से समझौता न करने पर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या हो सकती है।
२- मेरी बूढी माता जी चबूतरे पर बैठी थी, एक ईंट मारी गई जो निशाना चूक जाने से सर के ऊपर से निकलकर दीवार से टकराई। होली के पहले ३ दिनों घर में ईंट-पत्थर फिके।
३- २२ सितम्बर की दुर्घटना में मैं किस हालत मै सैफई मैं था पूरा परिवार परिचर्या में था, मकान खाली था । रामबाबू का नाती चोरी की नियत से चढ़ा। इंटों से बने खम्भे से रस्सी बाँध कर वह उतरा तो ५-५ फुट के तीन खम्भे धराशाही हो गए, क्योंकि चारो खम्भे टीन-शैड के लिए एंगिल में कसे थे।
४- मेरे ऊपर दबाव बनाने को राजेश वकील ने कानपुर जाकर मेरे बड़े भाई से विनती की। कुछ वकीलों से भी सिफारिस की। मैं सत्य पर अडिग हूँ , धन के प्रलोभन का भी प्रयास हुआ।
५- तथा कथित वैद्य रमाकांत के पास ८० के दसक में दिनरात का कार्ड बना था, इस लिहाज से वह पत्रकार रहा । रमाकांत ने कुछ पत्रकारों के माध्यम से दबाव का प्रयास किया, व्यापारी नेताओं लालू गुट से भी मुझे फ़साने का प्रयास किया।
६-तथा कथित वैद्य - पत्रकार रमाकांत ने दिनरात के अपने पुराने साथी ज्ञानार्थी पर डोरे डाले , काफी सफलता भी मिली। आई ऐ सी आन्दोलन में स्वयं फर्जी कर्ताधर्ता ज्ञानार्थी ने मेरे खिलाफ मुहीम छेड़ दी। फिर क्या था मंजू-काण्ड के आरोपिओं की बांछे खिल गईं। इसका खुलासा तब हुआ जब तथा कथित वैद्य रमाकांत व वकील के साहबजादों को आपस में खुशियाँ मनाते देखा गया- अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे ख़ुद उन्ही के साथिओ ने उसे (devesh) को 420 सावित कर दिया । दूसरी ओर ज्ञानार्थी ने इस दुरभि संधि का संकेत तब दिया जब पंगुजी के १९८६ के घटना क्रम के जानकारी ख़ुद मुझसे लेनी चाही। यानि सत्य एक बार फिर जीता।
७- पराने खिलाडीरामबाबू ने प्रसिद्द मिस्त्री जियालाल की ओलादों को भागने के बाद अपने अग्रज श्रीकृष्ण अनुज राजबहादुर, विजय सिंह को उनकी अचल संपत्ति take भाव हथियाकर बेदखल कर दिया फिर कामता खटिक का मकान भी रोचक अंदाज में अपने कब्जे में किया खटिक पुत्र केशकुमार देशकुमार bedhar हो गए थे। कुछ इसी अंदाज में मेरे घर पर भी उसकी नजर ही नहीं रहीं बल्कि पिता जी पर प्रेस्सर बनाया, वे मरने से पहले कही दफा कहते रहे - बेटा ये मकान इन्हीं को बेच कर चलें, मैं कहकर टालता रहा- पापा! यहीं रहना है। एसे में ज्ञानार्थी का पंगुजी के बारे में जानकारी मागना का क्या आर्थ है?
साथिओ ! सब उपाय कर चुकने के बाद अब रामबाबू की संताने और नाती सीधे-सीधे मेरे परिवार की सामूहिक हत्या पर उतारू हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसका संकेत मौहल्ले के उन जैनियो ने यह कहकर दिया, गबाही छोडो सपथ पत्र देदो। जो अपने घर की सदस्य को मर सकते हैं उनके लिए तुम क्या चीज हो। यह सुझाव देने वाले वे जैनी हैं जिन्होंने मंजू-कांड के आरोपियों के पक्ष में शपथ पत्र दिए थे। क्या जिओ औरजीने दो का अर्थ यह है की राक्षसों को जीने दो और जमा खोरी- मिलावटखोरी कर जनता को लुटते हुए जिओ।
सत्यमेव जयते।

Monday, February 20, 2012

नापसन्दी का विकल्प



नापसन्दी का विकल्प

सत्यनिष्ठ और इमानदार विधायक कैसे चुने? सभी प्रत्याशी एक से बढ़कर एक हैं। यही सोच कर कम मतदान होता रहा। मेरे साथी बोले- सत्यनिष्ठ और इमानदार उम्मीदवार खड़ा तो किया जाये, विकल्प तो है नहीं, खाम-खाह मुर्ख बना रहे हो -सत्यनिष्ठ और इमानदार विधायक चुनो। मैंने कहा - विकल्प है, नापसन्दी का वोट। यह क्या वाला है? तो सुनो- आप वोट डालने बूथ पर पहुचें पीठासीन अधिकारी से नियम ४९ ओ के अंतर्गत फॉर्म १७ ऐ मांगें और उसपर नापसन्दी का वोट दें। है न विकल्प, यदि बहुतायत -नापसन्दी के वोट पड़े तो चुनाव निरस्त हो जाएगा। एसी स्थिति में सत्यनिष्ठ और इमानदार उमीदवारों को टिकट देना पार्टियो की मजबूरी हो जायेगी। निर्वाचन आयोग २०१४ के चुनाव में वोटिंग मशीन में ही -नापसन्दीके वोट का अतिरिक्त बटन की व्यवस्था कर सकता है। है न राईट टू रिजेक्ट,नापसन्दी का वोट।

Saturday, February 18, 2012

मित्रवर! इटावा , इष्ट साध्य है। ढेरों आख्यान हैं। सदाचारी सत्ता की पहल भी हमें करनी होगी, ३ दिन शेष हैं मतदान के। हम आप लोगों लो समझाएं,

Thursday, February 9, 2012

टीम अन्ना का दौरा निरस्त

मतदाता जागरूकता अभियान के तहत १५ फरवरी को इटावा में टीम अन्ना की रैली होनी थी जिसकी घोषणा स्वयं इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रदेश प्रभारी संजय सिंह आज़ाद ने इटावा स्थित देवराज भवन में प्रेस वार्ता के दौरान की थी। इसके बाद इंडिया अगेंस्ट करप्शन के इटावा प्रभारी शास्त्री देवेश ने २५ सदस्यीय आयोजन समिति बनाकर कार्य योजना का विभाजन करने हेतु बैठक बुलाई तो कुछ अराजक तत्वों ने कब्ज़ा जमा लिया और प्रभारी शब्द को लेकर हंगामा काटा, डॉ आशीष कुमार ने कहा - इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रदेश प्रभारी संजय भी फर्जी हैं , यदि रैली में अरविन्द केजरीवाल या किरण वेदी आदि किसी ने भी देवेश को इंडिया अगेंस्ट करप्शन का प्रभारी संबोधित किया तो वे लोग अलग लाउडस्पीकर लगाकर व पर्चे बाँट कर विरोध करेंगे। अंततः शास्त्री ने इस आयोजन से किनारा करने की घोषणा की और पूर्व प्रधानाचार्य वीरेंद्र सिंह चौहान के ऊपर सारा दारोमदार सौप दिया। साथ ही गणेश ज्ञानार्थी से किसी तरह का समझ्हौता करने से भी इनकार किया। ये सारा बाकया मीडिया में गया आन्दोलन नेतृत्व ने ३ दिन गहनता से परामर्श किया, और आज ९-२-१२ को यह कहते हुए इटावा रैली निरस्त कर दी कि शास्त्री जी को तनाव मुक्त रखने के लिए जरूर है इटावा में रैली न हो । ज्ञात हो कि २१-९-११ को संजय सिंह के साथ मैनपुरी जाकर जनमत संग्रह का सुभारम्भ कराकर शास्त्री ने k k इंटर कालेज में बैठक कराइ थी। बैठक में शराबी, मदकची व अपराधियो की गतिविधि पर संजय ने कहा था ऐसे लोगो को कोर कमिटी से हटा दो। अगले ही दिन २२-९-११ को दुर्घट में शास्त्री घायल हो गया १५ दिन ICU में रहा। ब्रेन इन्ज़र्ड शास्त्री की बजह से अरविन्द कजरी बल का पिछला कर्यक्रम निरस्त हो गया था । ३ बार संजय सिंह ने इटावा आकर देख लिया अब शास्त्री स्वस्थ हैं तो १५ फरवरी का कार्यक्रम तय हुआ , दुर्भाग्य ही कहेंगे कि टीम अन्ना इटावा आते आते रह गयी। दूसरी ओर गणेश ज्ञानार्थी ने पोल-खोल आन्दोलन का ऐलान किया । इंडिया अगेंस्ट करप्शन के इटावा प्रभारी शास्त्री देवेश ने पोल-खोल आन्दोलन की घोषणा के लिए ज्ञानार्थी को धन्यवाद देते हुए स्वयं अपनी सच्चाई उजागर की ।

सन्मार्ग

बड़ी कठिन है डगर पनघट की